अक्का महादेवी- जिसने वासना पर विजय पाई.

अक्का महादेवी- जिसने वासना पर विजय पाई

🔵 कर्नाटक प्रांत के एक छोटे-से ग्राम उद्रुतडी में एक साधारण गृहस्थ के घर एक कन्या ने जन्म लिया-अक्का महादेवी उसका नाम रखा गया।

🔴 अक्का को उनके पिता श्री निर्मल ने संस्कृत की शिक्षा दिलाई। उससे धार्मिक संस्कार बल पा गए, उनके मन मे आध्यात्मिक जिज्ञासाएँ जोर पकड़ गई, उन्होंने सत्य की शोध का निश्चय कर लिया और उसी के फलस्वरूप वे ईश्वर-भक्ति, साधना और योगाभ्यास में लग गई।

🔵 आज हमें पाश्चात्य सभ्यता बंदी बना रही है। उन दिनों भारतवर्ष में मुस्लिम संस्कृति और सभ्यता की आँधी आई हुई थी। मुसलमान शासकों की दमन नीति से भयभीत भारतीय अपने धर्म अपनी संस्कृति को तेजी से छोड़ते जा रहे थे। ऐसे लोग थोडे़ ही रह गये जिनके मन में इस धार्मिक अवसान के प्रति चिंता और क्षोभ रहा हो, जिन्होंने अपने धर्म और संस्कृति के प्रति त्याग भावना का प्रदर्शन किया हो।

🔴 अक्का महादेवी-एक साधारण-सी ग्राम्य बाला ने प्रतिज्ञा की कि वह आजीवन ब्रह्मचारिणी रहकर, ईश्वर उपासना और समाज सेवा में रत रहकर अपने धार्मिक गौरव को बढायेगी।

🔵 अक्का का सौंदय वैसे ही अद्वितीय था, उस पर संयम और सदाचार की तेजस्विता की कांति सोने में सुहागा बन गई। उनके सौदर्य की तुलना राजकुमारियों से की जाने लगी।

🔴 तत्कालीन कर्नाटक के राजा कौशिक को अक्का महादेवी के अद्वितीय सौदर्य का पता चला तो उनके सामने विवाह का प्रस्ताव रखा। साधारण लोगों ने इसे अक्का का महान् सौभाग्य समझा पर अक्का ने उस प्रलोभन को भगवान् की उपस्थित की हुई परीक्षा अनुभव की। उन्होंने विचार करके देखा-सांसारिकता और धर्म-सेवा दोनों बातें एक साथ नहीं चल सकती। भोग और योग में कोई संबंध नहीं। यदि अपनी संस्कृति को जीवन देना है तो सांसारिक सुखोपभोग को बढ़ाया नहीं जा सकता।

🔵 इच्छाओं को बलिदान करके ही उस लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है। यह विचार आते ही उन्होने कौशिक का प्रस्ताव ठुकरा दिया।

🔴 जिनके उद्देश्य छोटे और तृष्णा-वासनाओं से घिरे हुए हों, वह बेचारे त्याग तपश्चर्या का महत्त्व क्या जान सकते हैं, कौशिक ने इसे अपना अपमान समझा। उसने अक्का के माता-पिता को बंदी बनाकर कारागार में डलवाकर एक बार पुन: संदेश भेजा- ''अब भी संबंध स्वीकार कर लो अन्यथा तुम्हारे माता-पिता का वध कर दिया जायेगा। ''

🔵 अक्का ने विचार किया-लोक में अपने माता-पिता, भाई-बंधु भी आते है। सबके कल्याण की बात सोंचें तो उनके ही कल्याण को क्यों भुलाऐं ? सचमुच यह बडा सार्थक भाव था उसे भुलाने का भाव ही पलायनवाद के रूप में इस देश में पनपा तो भी उन्होंने सूझ से काम लिया-इन्होंने एक शर्त पर प्रस्ताव स्वीकार कर लिया कि वह समाज-सेवा, संयम और साधना का परित्याग न करेगी। कौशिक ने यह बात मान ली।

🔴 विवाह उन्होंने कर लिया पर अपनी निष्ठा से अपने कामुक पति को बदलकर संत वना दिया। अक्का और कौशिक दोनों ने मिलकर अपने धर्म, अपनी संस्कृति का सर्वत्र खूब प्रसार किया, उसी का यह फल है कि कर्नाटक प्रांत अभी भी पाश्चात्य सभ्यता के बुरे रंग से बहुत कुछ बचा हुआ है।🌷🌹

Santoshkumar B Pandey at 9.56am

Comments

Popular posts from this blog

Brave 13th century Hindustani queen Rudramadevi

🙏🌹Duties of Wife and husband towards each other (from Vedas ) 💞🙏

Women in Social life: An exploration through Vedic Culture.